भार्या मोह
अक्टूबर ४, दो हज़ार आठ, बस अपने ही थे
ठाठ-बाट ।
कोई और नहीं था हम-सा वहां,करले जो
तुमसे सांठ-गांठ ।।
असमंजस साथ चले उस दिन, प्रियजन
अपने सात-आठ ।
फिर घर पे उनके, मिले जो लोचन, मिलकर
चारों हुए आठ ।।
पुरोहित ने मंत्र पढ़े़ पर-हित, आशीष बड़ों का
आन मिला ।
सुखप्रद-वैवाहिक जीवन-पथ का हम दोनों को
वरदान मिला ।।
परिवार अवस्थी और त्रिपाठी, दोनों ही
जब एक हुए ।
श्री राधा-दिनेश को पुत्र-रूप, निर्मलानन्द
"वृन्दान्त" मिला ।।
मिलन प्रथम विस्मरण-रहित था, बता ना पाया
तुमसे कभी ।
फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं
था तुमसे कभी ।।
फिर आई रात फरवरी तेरह, उस पल शुभ
तिलकोत्सव मेरा ।
"सद्भावना" में बारात लिए फिर, सोलह को
था, स्वागत मेरा ।।
सोलह को, सोलह श्रृंगार, करके तू नीचे
आई थी ।
माथे बेंदी, कान में झुमका, नाक में नथ
लटकाई थी ।।
चूड़ी और कंगन ने कुछ, तेरी कलाई
झुकवाई थी ।
कटि-बन्ध, स्वर्ण आभूषण से, तेरी वो कमर,
लचकाई थी ।।
जयमाल रूप परिवर्तित कर, वरमाल संग ले
आई थी ।
एकक्षण तो लगा तू इसजगमें मुझको ही वरने
आई थी ।।
निश्छल प्रेम, विरह की पीड़ा, जता न पाया
तुमसे कभी ।
फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं
था तुमसे कभी ।।
सातों फेरों संग सात वचन, हमने थे मन से
मान लिए ।
तेरे भरण व पोषण को, बिन थके, रात-दिन
काम किए ।।
स्वजनों से सम्मान मिले तुझको, अपने घर से
प्रस्थान किए ।
ना धर्म किए हमने तुझ-बिन, ना ही कुछ भी
है दान दिए ।।
देव-स्थल भी ना गए अकेले, ना तुम-बिन है
शान प्रिए ।
बस एक वचन से भ्रमित हुए, अब लेलो चाहें
जान प्रिए ।।
अब बहुत हो चुकी क्षमा-याचना, दे दो
मुझको अब त्राण प्रिए ।
अब या तो मुझको स्वयं का मन दे दो, या
ले लो मेरे प्राण प्रिए ।।
उदासीन हूं, हृदय-वेदना, दिखा ना पाया,
तुमसे कभी ।
फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं
था तुमसे कभी ।।
नन्हें से दो पुष्प हमारे, हैं वरदान स्वरूप,
विधाता के ।
शिवांश और रुद्रांश नाम, कुलभूषण-वत्स
वो माता के ।।
उनमें जो कुछ भी संस्कार है, स्व-रक्त-कणों
से पोषित है ।
उनके हृदय में, अपनी छवि भी, देव-गणों
सी भूषित है ।।
शिक्षा-दीक्षा सब सही मिले, ये चिंता तुमको
हर पल है ।
जीवन-जटिल तपस्या के, परिणाम-रूप में
ये फल है ।।
हे पुत्रों ! तुम पर सदा कृपा, भोले बाबा की
बनी रहे ।
मॉं-सा हृदय रहे कोमल, पर, दृढ़ता पापा-सी
बनी रहे ।।
अब मेरी करुणता और विवश्ता,सहन ना होगी
तुमसे कभी ।
फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं
था तुमसे कभी ।।





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