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कभी जाओ अयोध्या तुम | सर्वश्रेष्ठ राम भजन | श्री राम मंदिर अयोध्या

  कभी जाओ अयोध्या तुम सर्वश्रेष्ठ राम भजन श्री राम मंदिर अयोध्या को सादर प्रेषित ॥ जय श्री राम ॥ कभी जाओ , अयोध्या तुम ; मेरी पाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! ये कोदण्डधारी से कहना ; मुझे कब तक बिसारोगे ! मैं कण्टक , राह का बन जाऊं ; प्रभु तब तो निहारोगे !! हरि के नाम से अर्जित ; मेरी थाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … जो उनसे , भेंट हो तो ; क्या मेरे ये प्रश्न पूछोगे ? युगल के चरण-कमलों को ; मेरे साथी क्या छू लोगे ? मेरे कुल के दीपक संग ; मेरी बाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … हैं लाखों स्वप्न , नैनों में ; सानुज सिया-राम आऐंगे ! पवनसुत साथ हैं उनके ; सदा ही काम आएंगे !! जहां हैं ये सभी बसते ; मेरी छाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … मिले जो पुन्य , सत्कर्मों के ; वे ही साथ जाएंगे ! जो मानवता के प्रतिबिम्ब हैं ; वे ही फल हाथ आऐंगे !! पिता की सीख , लोरी मॉं ; मेरी गाती ,...

भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि

 भार्या मोह

भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि

अक्टूबर ४, दो हज़ार आठ, बस अपने ही थे 

ठाठ-बाट ।

कोई और नहीं था हम-सा वहां,करले जो 

तुमसे सांठ-गांठ ।।

असमंजस साथ चले उस दिन, प्रियजन 

अपने सात-आठ ।

फिर घर पे उनके, मिले जो लोचन, मिलकर 

चारों हुए आठ ।।

पुरोहित ने मंत्र पढ़े़ पर-हित, आशीष बड़ों का 

आन मिला ।

सुखप्रद-वैवाहिक जीवन-पथ का हम दोनों को 

वरदान मिला ।।

परिवार अवस्थी और त्रिपाठी, दोनों ही 

जब एक हुए ।

श्री राधा-दिनेश को पुत्र-रूप, निर्मलानन्द 

"वृन्दान्त" मिला ।।


मिलन प्रथम विस्मरण-रहित था, बता ना पाया 

तुमसे कभी । 

फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं

था तुमसे कभी ।।


भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि



फिर आई रात फरवरी तेरह, उस पल शुभ

तिलकोत्सव मेरा ।

"सद्भावना" में बारात लिए फिर, सोलह को 

था, स्वागत मेरा ।।

सोलह को, सोलह श्रृंगार, करके तू नीचे 

आई थी ।

माथे बेंदी, कान में झुमका, नाक में नथ 

लटकाई थी ।।

चूड़ी और कंगन ने कुछ, तेरी कलाई 

झुकवाई थी ।

कटि-बन्ध, स्वर्ण आभूषण से, तेरी वो कमर, 

लचकाई थी ।।

जयमाल रूप परिवर्तित कर, वरमाल संग ले 

आई थी ।

एकक्षण तो लगा तू इसजगमें मुझको ही वरने 

आई थी ।।


निश्छल प्रेम, विरह की पीड़ा, जता न पाया

तुमसे कभी ।

फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं

था तुमसे कभी ।।


भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि



सातों फेरों संग सात वचन, हमने थे मन से 

मान लिए ।

तेरे भरण व पोषण को, बिन थके, रात-दिन 

काम किए ।।

स्वजनों से सम्मान मिले तुझको, अपने घर से 

प्रस्थान किए ।

ना धर्म किए हमने तुझ-बिन, ना ही कुछ भी 

है दान दिए ।।

देव-स्थल भी ना गए अकेले, ना तुम-बिन है 

शान प्रिए ।

बस एक वचन से भ्रमित हुए, अब लेलो चाहें 

जान प्रिए ।।

अब बहुत हो चुकी क्षमा-याचना, दे दो 

मुझको अब त्राण प्रिए ।

अब या तो मुझको स्वयं का मन दे दो, या 

ले लो मेरे प्राण प्रिए ।।


उदासीन हूं, हृदय-वेदना, दिखा ना पाया, 

तुमसे कभी ।

फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं

था तुमसे कभी ।।

भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलिभार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि                        भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि                  






नन्हें से दो पुष्प हमारे, हैं वरदान स्वरूप,

विधाता के ।

शिवांश और रुद्रांश नाम, कुलभूषण-वत्स 

वो माता के ।। 

उनमें जो कुछ भी संस्कार है, स्व-रक्त-कणों

से पोषित है ।

उनके हृदय में, अपनी छवि भी, देव-गणों 

सी भूषित है ।।

शिक्षा-दीक्षा सब सही मिले, ये चिंता तुमको

हर पल है ।

जीवन-जटिल तपस्या के, परिणाम-रूप में

ये फल है ।।

हे पुत्रों ! तुम पर सदा कृपा, भोले बाबा की 

बनी रहे ।

मॉं-सा हृदय रहे कोमल, पर, दृढ़ता पापा-सी 

बनी रहे ।।


भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि



अब मेरी करुणता और विवश्ता,सहन ना होगी 

तुमसे कभी ।

फिर भी कहती हो, प्रये सदा, हमें मोह नहीं

था तुमसे कभी ।।

भार्या मोह : प्रत्येक भारतीय पत्नी की अपने पति से शिकायत | @ वृन्दावलि


✍️
आचार्य "वृन्दान्त" ✍️

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