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कभी जाओ अयोध्या तुम | सर्वश्रेष्ठ राम भजन | श्री राम मंदिर अयोध्या

  कभी जाओ अयोध्या तुम सर्वश्रेष्ठ राम भजन श्री राम मंदिर अयोध्या को सादर प्रेषित ॥ जय श्री राम ॥ कभी जाओ , अयोध्या तुम ; मेरी पाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! ये कोदण्डधारी से कहना ; मुझे कब तक बिसारोगे ! मैं कण्टक , राह का बन जाऊं ; प्रभु तब तो निहारोगे !! हरि के नाम से अर्जित ; मेरी थाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … जो उनसे , भेंट हो तो ; क्या मेरे ये प्रश्न पूछोगे ? युगल के चरण-कमलों को ; मेरे साथी क्या छू लोगे ? मेरे कुल के दीपक संग ; मेरी बाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … हैं लाखों स्वप्न , नैनों में ; सानुज सिया-राम आऐंगे ! पवनसुत साथ हैं उनके ; सदा ही काम आएंगे !! जहां हैं ये सभी बसते ; मेरी छाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … मिले जो पुन्य , सत्कर्मों के ; वे ही साथ जाएंगे ! जो मानवता के प्रतिबिम्ब हैं ; वे ही फल हाथ आऐंगे !! पिता की सीख , लोरी मॉं ; मेरी गाती ,...

Best Poetry On Father | 2024 | Pita Par kavita | पिता का क़द | Father's Day | VrandaVali

 पिता का क़द


पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


"वृन्दान्त", सकल-संसार का नव निर्माण, 

तेरे अब वश में है ।

गाण्डीव से भी ना सधे जो बाण,

वो तेरे तरकश में है ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


बाप का क़द नापने की ज़िद,

पकड़ बैठा है तो सुन ।

तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, जो,

तेरे नस नस में है ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |

पिता हैं वो, जिसने तुझको जन्म से, 

स्वयं ही तराशा ।

स्वयं उठाया, स्वयं चलाया, स्वयं सिखायी,

विश्व-विजयी परिभाषा ।।

छू ना पाए, मन को तेरे, सुधर्म-रोधक,

अज्ञानवश व्यभिचार कोई ।

बनकर दिखा दे, पितृ-भक्त श्रीराम उनको,

यही हर दशरथ की आशा ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |

कहां ढूंढ़ेगा तू, चलचित्रों में, और

पर-सभ्यता में ।

ना मिलेगा तुझको, वो आनन्द, जो 

पिता संग, सर्कस में है ।

तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, 

जो तेरे नस नस में है ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


पिता हैं वो, जिसने तुझको स्वाबलंबी,

कर्मठ बनाया ।

कर्तव्यनिष्ठा का सफल संकल्प देकर, तेरा,

हर संकट हटाया ।।

वो कभी भी ना झुका है, लाख

प्रतिकूलित समय हो ।

कोटि हठियों का, समय अनुकूल

करके हठ मिटाया ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


क्या कोई सुख पाएगा, आकाश

के यानों में तू फिर ।

जब ज्ञात होगा, बाप तेरा, 

शत-जन भरी एक बस में है ।।

तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, 

जो तेरे नस नस में है ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


पिता हैं वो, जिनसे बिन्दी, चूड़ी

कंगन, मॉं पे भाएं ।

पांव पायल, कान बाली, नाक 

नथ, मन को लुभाएं ।।

रहें दोनों साथ, जब तक 

शशि-दिवाकर हैं गगन में ।

है कामना, मॉं की, सदा ही

सिन्दूर, पितु माथे सजाएं ।।

पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


श्रंगार मॉं के, सब अलौकिक

शक्ति से भरपूर हैं जो ।

उस शक्ति का गौरव, समर्पण

भी पिता के वश में है ।।

तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, 

जो तेरे नस नस में है ।।



बाप का क़द नापने की ज़िद,

पकड़ बैठा है तो सुन ।

तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, जो,

तेरे नस नस में है ।।


पिता का क़द | पिता का वास्तविक महत्व | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |


✍️ आचार्य "वृन्दान्त" ✍️


कृपया इसे पढ़ना न भूलें 🙏

मॉं का मूल्य




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