पिता का क़द
"वृन्दान्त", सकल-संसार का नव निर्माण,
तेरे अब वश में है ।
गाण्डीव से भी ना सधे जो बाण,
वो तेरे तरकश में है ।।
बाप का क़द नापने की ज़िद,
पकड़ बैठा है तो सुन ।
तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, जो,
तेरे नस नस में है ।।
पिता हैं वो, जिसने तुझको जन्म से,
स्वयं ही तराशा ।
स्वयं उठाया, स्वयं चलाया, स्वयं सिखायी,
विश्व-विजयी परिभाषा ।।
छू ना पाए, मन को तेरे, सुधर्म-रोधक,
अज्ञानवश व्यभिचार कोई ।
बनकर दिखा दे, पितृ-भक्त श्रीराम उनको,
यही हर दशरथ की आशा ।।
कहां ढूंढ़ेगा तू, चलचित्रों में, और
पर-सभ्यता में ।
ना मिलेगा तुझको, वो आनन्द, जो
पिता संग, सर्कस में है ।
तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको,
जो तेरे नस नस में है ।।
पिता हैं वो, जिसने तुझको स्वाबलंबी,
कर्मठ बनाया ।
कर्तव्यनिष्ठा का सफल संकल्प देकर, तेरा,
हर संकट हटाया ।।
वो कभी भी ना झुका है, लाख
प्रतिकूलित समय हो ।
कोटि हठियों का, समय अनुकूल
करके हठ मिटाया ।।
क्या कोई सुख पाएगा, आकाश
के यानों में तू फिर ।
जब ज्ञात होगा, बाप तेरा,
शत-जन भरी एक बस में है ।।
तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको,
जो तेरे नस नस में है ।।
पिता हैं वो, जिनसे बिन्दी, चूड़ी
कंगन, मॉं पे भाएं ।
पांव पायल, कान बाली, नाक
नथ, मन को लुभाएं ।।
रहें दोनों साथ, जब तक
शशि-दिवाकर हैं गगन में ।
है कामना, मॉं की, सदा ही
सिन्दूर, पितु माथे सजाएं ।।
श्रंगार मॉं के, सब अलौकिक
शक्ति से भरपूर हैं जो ।
उस शक्ति का गौरव, समर्पण
भी पिता के वश में है ।।
तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको,
जो तेरे नस नस में है ।।
बाप का क़द नापने की ज़िद,
पकड़ बैठा है तो सुन ।
तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, जो,
तेरे नस नस में है ।।
✍️ आचार्य "वृन्दान्त" ✍️
कृपया इसे पढ़ना न भूलें 🙏







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