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जून, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कभी जाओ अयोध्या तुम | सर्वश्रेष्ठ राम भजन | श्री राम मंदिर अयोध्या

  कभी जाओ अयोध्या तुम सर्वश्रेष्ठ राम भजन श्री राम मंदिर अयोध्या को सादर प्रेषित ॥ जय श्री राम ॥ कभी जाओ , अयोध्या तुम ; मेरी पाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! ये कोदण्डधारी से कहना ; मुझे कब तक बिसारोगे ! मैं कण्टक , राह का बन जाऊं ; प्रभु तब तो निहारोगे !! हरि के नाम से अर्जित ; मेरी थाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … जो उनसे , भेंट हो तो ; क्या मेरे ये प्रश्न पूछोगे ? युगल के चरण-कमलों को ; मेरे साथी क्या छू लोगे ? मेरे कुल के दीपक संग ; मेरी बाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … हैं लाखों स्वप्न , नैनों में ; सानुज सिया-राम आऐंगे ! पवनसुत साथ हैं उनके ; सदा ही काम आएंगे !! जहां हैं ये सभी बसते ; मेरी छाती भी ले जाना ! मैं पापी हूं , मुझे छोड़ो ; मेरी माटी ही ले जाना !! कभी जाओ , अयोध्या तुम … मिले जो पुन्य , सत्कर्मों के ; वे ही साथ जाएंगे ! जो मानवता के प्रतिबिम्ब हैं ; वे ही फल हाथ आऐंगे !! पिता की सीख , लोरी मॉं ; मेरी गाती ,...

Sundar Kand Path | Bolo Bajrang Bali Ki Jai | Hanuman Chalisa | Ram Mandir Ayodhya | VrandaVali

  बोलो " बजरंगबली" की जय   " वृन्दान्त " रचित, स्वभाष्य सुरभित, काव्यास्त्र, ॥ वृन्दावलि की जय ॥ गुंजायमान हो, ये जग सारा, बंधु प्रिय, एक स्वर में बोलो, ॥ बजरंग बली की जय ॥ बजरंगी हैं, जो जन्मे, हरियाणा के कैथल में थे। बजरंगी हैं, जो बसते, मात-पिता के दिल में थे। बजरंगी हैं,जो मिलते,ऋषियों को कपिस्थल में थे। बजरंगी हैं, जिनके चर्चे, प्रायः ही, खल-दल में थे। उत्दंड निशाचर, भूचर, जलचर, सबमें ही था भ य। गुंजायमान हो, ये जग सारा, बंधु प्रिय, एक स्वर में बोलो, ॥ बजरंग बली की जय ॥ बजरंगी हैं, जिसने सबको, भक्ति की शक्ति दिखलाई। बजरंगी हैं, जिसकी सेवा, श्री राम प्रभु के मन भाई। बजरंगी हैं, जिनके सम्मुख, मां सुरसा थीं चकराई। बजरंगी हैं, जिनके बल से, स्वयं लंकिनी घबराई। जब सिय ने, राम मुद्रिका देखी, दूर हुआ तब भय। गुंजायमान हो, ये जग सारा, बंधु प्रिय, एक स्वर में बोलो, ॥ बजरंग बली की जय ॥ बजरंगी हैं, जिसने मॉं के अश्रु-रहित, वो नयन किए। बजरंगी हैं,जिसने दुर्गम बाग के फल,स्वयं चयन किए। बजरंगी हैं, जिनसे भिड़ने, दुर्जन-दानव, भ्रमण किए। कितने रक्त-वमन किए, कितने परलोक गमन किए। ...

Best Poetry On Father | 2024 | Pita Par kavita | पिता का क़द | Father's Day | VrandaVali

  पिता का क़द " वृन्दान्त ", सकल-संसार का नव निर्माण,  तेरे अब वश में है । गाण्डीव से भी ना सधे जो बाण, वो तेरे तरकश में है ।। बाप का क़द नापने की ज़िद, पकड़ बैठा है तो सुन । तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको, जो, तेरे नस नस में है ।। पिता हैं वो, जिसने तुझको जन्म से,  स्वयं ही तराशा । स्वयं उठाया, स्वयं चलाया, स्वयं सिखायी, विश्व-विजयी परिभाषा ।। छू ना पाए, मन को तेरे, सुधर्म-रोधक, अज्ञानवश व्यभिचार कोई । बनकर दिखा दे, पितृ-भक्त श्रीराम उनको, यही हर दशरथ की आशा ।। कहां ढूंढ़ेगा तू, चलचित्रों में, और पर-सभ्यता में । ना मिलेगा तुझको, वो आनन्द , जो  पिता संग, सर्कस में है । तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको,  जो तेरे नस नस में है ।। पिता हैं वो, जिसने तुझको स्वाबलंबी, कर्मठ बनाया । कर्तव्यनिष्ठा का सफल संकल्प देकर, तेरा, हर संकट हटाया ।। वो कभी भी ना झुका है, लाख प्रतिकूलित समय हो । कोटि हठियों का, समय अनुकूल करके हठ मिटाया ।। क्या कोई सुख पाएगा, आकाश के यानों में तू फिर । जब ज्ञात होगा, बाप तेरा,  शत-जन भरी एक बस में है ।। तेरी औकात क्या ? जो परखे उनको,  जो तेर...

अब राम कहां से लाएं | मानव की पंच अवस्थाओं का अद्भुत विश्लेषण | हिन्दी कविता | वृन्दावलि |

  अब राम कहां से लाएं मानव की पंच अवस्थाओं  का अद्वितीय विश्लेषण   " वृन्दान्त " जटिल जीवन-पथ में, विश्राम कहां से लाएं | सब अपने-अपने बांट चुके, अब राम कहां से लाएं || नन्हे बचपन की यादों में, दिन पतंगों से कटते थे | लड़कर मित्रों और यारों से, सद्दी-मांझों में बंटते थे || मां की पायल झनकार को सुन, हम बन्दूकों से डरते थे | और जब थककर सो जाए मां, फिर दबे पांव खिसकते थे || मां के अधरों पे फिर वैसी, मुस्कान कहां से लाएं | सब अपने-अपने बांट चुके, अब राम कहां से लाएं || युवावस्था के वो दिन भी, हमें खूब सुहाने लगते थे | जब गली-मोहल्लों में स्वयं को, स्वयं, हम ही सयाने लगते थे || ना जाने कितने छज्जे, अटिया, और छत पैरों नपते थे | मां की क्रोधित सुर-ताल को सुन, हम आंगन बीच टपकते थे || फिर मां ने जोड़ों पर जो रगड़ा, वो बाम कहां से लाएं | सब अपने-अपने बांट चुके, अब राम कहां से लाएं || प्रौढ़ावस्था में आते ही,  तन, मन को धन से जोड़ दिया | रिश्ते-नाते सब छूट गए, स्वयं अपना हृदय कठोर किया || बच्चों के उदर को भरने को, मैं बिकता रहा बाज़ारों में | अपनों की खुशियों के खात...